ना जाने क्यों उम्र बढ़ती है ,-पार्थो सरकार

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सप्तरी टुडे 

बैशाख-८

ना जाने क्यों उम्र बढ़ती है ,
और रिश्ते कम हो जाते हैं ।

इस लंबी उम्र में
न जाने कितनी यादें बनाई,
यादों से एक दुनिया बनाई ।
और अब यही दुनिया आंखों से धुंधली दिखती है ।
और वो यादें भी धुंधली हो गई है ।

तीन कमरों का मकान
बड़े अरमान से बनाया था,
आज उस पर एक और मंज़िल चढ़ गई है ।

बड़ा शौक था मुझे छत पर गस्त लगाने का ,
अब सीढ़ियां चढ़ते ही चेहरे पर सिकंद आती है ,
चढ़ते चढ़ते ये उम्र नीचे उतार देती है ।

आकाश में उड़ती चिड़िया की आवाज सुन
मैं उसे देखने को व्याकुल होता ,
ज्यों ही ऊपर उठता,
ये कमर नीचे झुका देती है ।

कभी बेफिजूल बेपरवाह घूमता था,
आज पोती हाथ पकड़ मुझे रास्ता दिखाती है ।
उसकी हथेली पकड़ मैं भी चल लेता हूं,
जीने कि उम्मीद जग जाती है ।

मरने का डर नहीं ,
मगर,
बेचैन रहता हूं,
नींद भी नहीं आती है ।

अक्सर किस्से सुने और देखे थे मैंने ,
ये बढती उम्र कितना कमजोर करती जाती है ।
दिन काटना मुश्किल सा है ,
और कट जाए तो रात आ जाती है ।

और रिश्ते !
रिश्तों में तो मेरे कम ही लोग बचे हैं,
हां ! नए रिश्ते बने है,
मगर उन्हें मेरी याद कहां !

त्योहारों पर भीड़ तो बहुत हो जाती है ,
और शोर शराबा भी कहां पसंद है ।
पर पसंद की रसमलाई आती है मेरे लिए,
वहीं मुझे पसंद आती है ।
इस तरह ही अब चेहरे पर रोनक आती है ।

लेख्य-पार्थो सरकार

राजविराज सप्तरी 

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